तुम नजर झुकाने मे लगे थें, तुमने सोचा ही नही ...
ये अश्क जो गिर गये अगर तो, एक मसला हो जायेगा !!
Thursday, October 7, 2010
Friday, September 17, 2010
रिश्ते
सच को बयां करें वह आईना ना मिला
खुद जैसा मुझे कोई अजनबी ना मिला !
अजीब है ये रिश्तो की कश्मोकश की डोरी
तमाम उम्र साथ रहा और मुझसे कभी ना मिला !
अजनबी शहर हैं दिल्ली,यहाँ का आलम देखिये
लोगो ने हाथ मिला ली, पर दिल ना मिला !
इश बहार में यह बाग़ को देखो
हर पेड़ हरा है , कोई पत्ता हरा ना मिला !
ये खुदा तेरे इश जहाँ में "राणा"
एक आरजू की और मुझे वह ना मिला !
© सर्वाधिकार सुरक्षित - राणा नवीन
Thursday, September 2, 2010
Sunday, July 18, 2010
एक ख्याब, एक प्यार
ज़ब खिलते हैं एक ख्याब, एक प्यार .......
जलते भि है...ख़ालीपन से भरा आसमान.....
© सर्वाधिकार सुरक्षित-राणा नवीन
Saturday, March 27, 2010
मोहब्बत
तुमसे मोहब्बत में मैंने ज़िन्दगी गवाई है
आँशु, यादें और जुदाई ज़िन्दगी की कमाई हैं!!
हर पल हर लम्हा बेबश है ये दिल
हर पल दस्ती रहती ये तन्हाई हैं !!
तुमसे बिछड़ कर भी जिंदा हूँ
मेरे साथ बीत गयी एक कहानी, जो तुम्हें सुनाई हैं !!
हर समय, हर एक रूप में तुम मेरी हों
कैसे कह दूं की ,तुम जान नहीं हरजाई हैं !!
साथ अगर तुम देती मंजिल तक "राणा"
फिर क्यूँ होती, जो आग ये रुसवाई हैं !!
© सर्वाधिकार सुरक्षित-राणा नवीन
Saturday, March 20, 2010
भुलाया
तेरी यादों का महल बनाया हमने,
अश्कों से चिराग जलाया हमने ,
भूलनेवाले तुझे रब दा वास्ता
कोई ओ लम्हा बता- जिसमे तुझे भुलाया हमने !
अश्कों से चिराग जलाया हमने ,
भूलनेवाले तुझे रब दा वास्ता
कोई ओ लम्हा बता- जिसमे तुझे भुलाया हमने !
Sunday, March 7, 2010
गर्भपात
मेरी कुंआरी अपेक्षाओं का
जब तेरे अस्तित्व से
समागम हुआ था, तो
एक विचित्र सी
हलचल - एक सिहरन
दौड गयी
मेरे समस्त शरीर में
धीरे-धीरे यह सिहरन
एक रूप धारण करने लगी !
मगर -अचानक
तुम्हारा अस्तित्व छूट गया
मेरे हाथों में से रेत की तरह !
मेरे गर्भ मे पलने वाली
आकांक्षा , अचानक
एक पाप का रूप
धारण कर गई
किसी पिता के अभाव में !
कुछ दिन स्त्ब्ध रह कर
उस आकांक्षा से मुक्ति पाने हेतु
मैंने गर्भपात करवा लिया
और अब एक बार फिर
'कुंआरी' बन गई हूँ,
किसी विधिवत समागम हेतु !
जब तेरे अस्तित्व से
समागम हुआ था, तो
एक विचित्र सी
हलचल - एक सिहरन
दौड गयी
मेरे समस्त शरीर में
धीरे-धीरे यह सिहरन
एक रूप धारण करने लगी !
मगर -अचानक
तुम्हारा अस्तित्व छूट गया
मेरे हाथों में से रेत की तरह !
मेरे गर्भ मे पलने वाली
आकांक्षा , अचानक
एक पाप का रूप
धारण कर गई
किसी पिता के अभाव में !
कुछ दिन स्त्ब्ध रह कर
उस आकांक्षा से मुक्ति पाने हेतु
मैंने गर्भपात करवा लिया
और अब एक बार फिर
'कुंआरी' बन गई हूँ,
किसी विधिवत समागम हेतु !
© सर्वाधिकार सुरक्षित -राजीव शर्मा( मेरे साथ कार्यरत )









(c) राना नवीन